Thursday, January 29, 2026
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टाइप-1 डायबिटीज से पीड़ित 3 से 15 वर्ष के बच्चें खेलने की उम्र में हाथ में थामना पड़ा ग्लूकोमीटर

जिस उम्र में बच्चों के हाथों में खिलौने होने चाहिए उस उम्र में कुछ बच्चे रोजाना इंसुलिन की सुई, ग्लूकोमीटर और डर थामे जी रहे हैं। जिले में टाइप-1 डायबिटीज से पीड़ित 3 से 15 वर्ष आयु के ऐसे ही सात बच्चों की पहचान स्वास्थ्य विभाग ने की है। जिनका बचपन बीमारी के सख्त अनुशासन में बंध गया है। इन बच्चों के लिए बीमारी सिर्फ एक मेडिकल शब्द नहीं बल्कि हर दिन की परीक्षा है खाना खाने से पहले जांच, खेलते वक्त कमजोरी का डर और स्कूल में अचानक चक्कर आने की आशंका।

मां, आज इंजेक्शन नहीं लगेगा न
जिले का एक 10 वर्षीय बच्चा जो पिछले कुछ समय से टाइप-1 डायबिटीज से पीड़ित है, रोज सुबह उठते ही सबसे पहले यही सवाल करता है। उसकी मां बताती हैं की जब सुई देखते ही बच्चा रोने लगता है, तो उसकी आंखें भर आती हैं। पर मजबूरी है एक दिन न लगे तो जान पर बन आती है। पिता कहते हैं हम डर के साथ जीते हैं। स्कूल में फोन आता है बच्चे को चक्कर आ गया। तब समझ आता है कि ये बीमारी सिर्फ बच्चे की नहीं, पूरे परिवार की हो जाती है। डायबिटीज से पीड़ित बच्चे अक्सर खुद को दूसरों से अलग महसूस करते हैं।

मुफ्त किट बनी राहत की पहली सांस
ऐसे बच्चों के लिए स्वास्थ्य विभाग की ओर से पिछले साल से ही गुब्बारा क्लीनिक योजना के तहत मुफ्त विशेष देखभाल किट दी जा रही है जिसमें ग्लूकोमीटर, टेस्ट स्ट्रिप्स, लैंसेट्स, इंसुलिन सुई, शामिल हैं। स्वास्थ्य अधिकारियों का कहना है की गुबारा क्लीनिक को टाइप-1 डायबिटीज से पीड़ित बच्चों के लिए एक सुरक्षित जगह के रूप में विकसित किया जा रहा है जहां बच्चे बिना डरे सवाल पूछ सकते हैं। अपनी बीमारी को समझ सकते हैं। खुद की देखभाल सीख सकते हैं। यहां इलाज के साथ हौसला भी बढ़ाया जाता है।

नियमित इंसुलिन ही जीवन का सहारा
जिला अस्पताल के वरिष्ठ फिजिशियन डॉ. एमके तिवारी ने बताया कि टाइप-1 डायबिटीज से ग्रस्त बच्चों को नियमित इंसुलिन लेना जीवनरक्षक है। समय पर सही डोज, ग्लूकोमीटर से रोज़ाना शुगर जांच और संतुलित आहार बहुत जरूरी है। भोजन न छोड़ें, कार्बोहाइड्रेट की गिनती सीखें और मीठे पेय से बचें। रोज हल्का-फुल्का व्यायाम करें, पर व्यायाम से पहले और बाद में शुगर जांचें। नियमित फॉलो-अप से बच्चा स्वस्थ, सक्रिय और आत्मविश्वासी रह सकता है। टाइप-1 डायबिटीज बच्चों के लिए आजीवन चुनौती है। प्रयास है कि कोई भी बच्चा संसाधनों की कमी या डर के कारण पीछे न रह जाए। ऐसे बच्चों को चिह्नित कर उन्हें जरूरी संसाधन मुहैया कराने की दिशा में लगातार काम चल रहा है। – डाॅ. केके अग्रवाल, सीएमओ

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