इन एजेंसियों ने देश भर के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों से बचे हुए शीर्ष नक्सली नेताओं को गिरफ्तार करने या खत्म करने के लिए व्यापक तलाशी अभियान शुरू किया है. ओडिशा, छत्तीसगढ़, झारखंड और आंध्र प्रदेश में विशेष अभियान चल रहे हैं. कुछ शीर्ष नेता, जिनमें गणपति उर्फ मुपाला लक्ष्मण राव उर्फ रमन्ना, मिसिर बिसरा और शुक्रू (सभी माओवादी केंद्रीय समिति के सदस्य) शामिल हैं, अभी भी फरार हैं. सोमवार को नई दिल्ली में नक्सल विरोधी अभियानों में लगे भारत के सुरक्षा प्रतिष्ठान के एक शीर्ष अधिकारी ने कहा, “अगर हम शीर्ष नेताओं को पकड़ लेते हैं, तो बचे हुए कैडर और उनके अनुयायी खुद ही आत्मसमर्पण कर देंगे.पिछले 48 घंटों में, सुरक्षा बलों ने ओडिशा के कंधमाल जिले के कोटागढ़ के वन क्षेत्रों में बड़ी सफलता हासिल की है. इस दौरान माओवादियों द्वारा कथित तौर पर बिछाई गई दो सक्रिय बारूदी सुरंगें बरामद की गईं और जंगल के भीतर छिपे एक माओवादी ठिकाने को नष्ट कर दिया गया.यह अभियान सीआरपीएफ की 127 बटालियन के कमांडेंट ने विशेष अभियान समूह (एसओजी) और जिला पुलिस के समन्वय से चलाया. अधिकारी ने बताया, “सुरक्षा एजेंसियां क्षेत्र में सक्रिय माओवादी नेता शुक्रु और उसके साथियों को पकड़ने के लिए तलाशी अभियान चला रही हैं. सुरक्षाकर्मी कंधमाल जिले के घने जंगलों में पहाड़ी और वन क्षेत्रों की निगरानी के लिए ड्रोन का इस्तेमाल कर रहे हैं.फरवरी में, माओवादी नेता थिप्पिरी तिरुपति उर्फ देवजी ने तेलंगाना पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया था. देवजी (62) ने मुलुगु जिले में वरिष्ठ केंद्रीय समिति सदस्य मल्ला राजी रेड्डी (संग्राम) सहित 20 अन्य कार्यकर्ताओं के साथ हथियार डाल दिए थे.11मार्च को छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में कम से कम 108 माओवादी कैडरों ने आत्मसमर्पण कर दिया, जिन पर कुल मिलाकर 3.95 करोड़ रुपये का इनाम था और जिनके पास हथियारों का बड़ा जखीरा था. सुरक्षा बलों के समक्ष एके-47 राइफलें, इंसास राइफलें, एसएलआर, लाइट मशीन गन, .303 राइफलें और बैरल ग्रेनेड लॉन्चर सहित 101 हथियार जमा किए गए हैं.
पश्चिम बस्तर मंडल से राहुल तेलम, पांद्रू कोवासी और झीत्रू ओयम; पूर्वी बस्तर मंडल से रामधर उर्फ बीरूऔर उत्तरी बस्तर मंडल से मल्लेश सहित कई माओवादी मंडल समिति सदस्यों (DVCM) ने आत्मसमर्पण किया है.सरक्षा बलों ने इन दोनों घटनाओं को हाल के दिनों में नक्सल विरोधी अभियानों में सबसे बड़ी सफलताओं में से एक बताया है. एक अधिकारी ने कहा, “सरकार द्वारा निर्धारित समय सीमा से पहले, माओवादी के केवल तीन केंद्रीय समिति सदस्य ही वांछित हैं.पिछले साल जनवरी तक माओवादियों के पास 21 केंद्रीय समिति सदस्य थे, जिनमें से 18 ने आत्मसमर्पण कर दिया या मुठभेड़ों में मारे गए थे. 2000 के दशक के आरंभिक वर्षों में सीपीआई (माओवादी) के पास 40-45 केंद्रीय समिति सदस्य थे.इस साल जनवरी में 23 माओवादियों को मार गिराया गया, जबकि 28 ने आत्मसमर्पण किया. लगातार चल रहे नक्सल-विरोधी अभियान के परिणामस्वरूप फरवरी में 10 माओवादी मारे गए और इस
साल 16 अन्य ने आत्मसमर्पण किया
आंकड़ों के अनुसार, सीआरपीएफ और अन्य सुरक्षा बलों और राज्य पुलिस बलों द्वारा चलाए गए विभिन्न अभियानों में पिछले साल 370 माओवादियों को मार गिराया गया, जिनमें एक पीबीएम और 10 केंद्रीय समिति सदस्य शामिल थे.सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025 के दौरान सुरक्षा बलों द्वारा 1175 माओवादियों, जमीनी कार्यकर्ताओं और समर्थकों को गिरफ्तार किया गया. इसी अवधि के दौरान कम से कम 2391 माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया. जनवरी 2025 तक, कम से कम 18 जिलों को “माओवादी प्रभावित” के रूप में वर्गीकृत किया गया था.निरंतर प्रयासों और आक्रामक परिचालन रणनीति के कार्यान्वयन के कारण, 2025 के अंत तक केवल आठ जिले ही “माओवादी प्रभावित” श्रेणी में रह गए हैं. ईटीवी भारत से बात करते हुए, जाने-माने सुरक्षा विशेषज्ञ और सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह ने कहा कि नक्सलियों के खात्मे के मामले में सरकार सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रही है.सिंह ने कहा, “सरकार नक्सलियों के खात्मे की 31 मार्च की समय सीमा को काफी हद तक हासिल कर सकती है. लेकिन सवाल यह है कि क्या सरकार झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, आंध्र प्रदेश और अन्य राज्यों के दूरदराज के आदिवासी क्षेत्रों में विकासात्मक गतिविधियों की निरंतर निगरानी और कार्यान्वयन कर पाएगी?” उन्होंने इस तथ्य पर प्रकाश डाला कि अधिकारियों की ओर से कई मौकों पर की गई लापरवाही आदिवासी बहुल दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के बीच सरकार विरोधी भावनाओं को भड़काती है.







