रुहेलखंड विश्वविद्यालय 15 फरवरी को अपना 51वां स्थापना दिवस मना रहा है। शिक्षकों और छात्रों के अथक संघर्ष से 15 फरवरी 1975 को रुहेलखंड विश्वविद्यालय की स्थापना हुई तो उच्च शिक्षा की राह आसान हुई। संघर्ष को अंजाम तक पहुंचाने में बरेली कॉलेज के रक्षा अध्ययन विभाग के तत्कालीन शिक्षक चौधरी नरेंद्र सिंह का सर्वाधिक योगदान रहा। उन्होंने न सिर्फ चिंगारी को हवा दी, बल्कि उसकी अगुवाई भी की। नतीजा, रुहेलखंड विश्वविद्यालय के रूप में सबके सामने है।वर्ष 1971 से ही रुहेलखंड क्षेत्र में विश्वविद्यालय बनाने की मांग जोर पकड़ने लगी थी। यहां के कॉलेज पहले कलकत्ता, फिर आगरा विश्वविद्यालय से संबद्ध रहे। इस कारण विद्यार्थियों को काफी असुविधा हो रही थी। तत्कालीन छात्र नेता सुरेंद्र अग्रवाल ने बताया कि प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा, 14 मई 1974 को शहर आए थे। वह स्वतंत्रता सेनानियों को ताम्रपत्र बांटने के लिए सर्किट हाउस से जीआईसी मैदान जाने के लिए निकल रहे थे। रास्ते में छात्रों की भीड़ उनका इंतजार कर रही थी।
छात्रों ने किया था तत्कालीन मुख्यमंत्री का घेराव
नावल्टी से रोडवेज, कोतवाली और जीआईसी की ओर जाने वाली सड़कों पर छात्र संगठनों के पदाधिकारियों-कार्यकर्ताओं सहित छात्र-छात्राओं की भीड़ खड़ी थी। उन्होंने मुख्यमंत्री की खुली जीप को नावल्टी पर रोक लिया। तब मुख्यमंत्री अपनी जीप पर सवार होकर विद्यार्थियों को संबोधित करने लगे। इस दौरान एक छात्र ने कहा कि आप अपने छोटे भाइयों से ऊंचाई से बात करेंगे? यह सुनकर मुख्यमंत्री छात्रों के बीच चले गए। वहां पहले से जेब में काली रुमाल लिए छात्रों ने मुख्यमंत्री का चेहरा ढककर उन पर वार करना शुरू कर दिया। इससे वहां भगदड़ मच गई। इंटेलिजेंस की टीम मुख्यमंत्री को गोद में उठाकर कोतवाली ले गई। कोतवाली परिसर में मुख्यमंत्री के लिए सेफ हाउस बनाया गया।
पुलिस ने किया था लाठाचार्ज
कोतवाली के बाहर लगी भीड़ को काबू करने के लिए पुलिस ने लाठीचार्ज शुरू किया। तत्कालीन पुलिस उपाधीक्षक ओपी मेहरोत्रा ने छात्रों को शांत कराना चाहा, लेकिन एक मिनट बाद ही एक छात्र ने पत्थर मारकर उन्हें घायल कर दिया। इसके बाद बल प्रयोग कर छात्रों को वहां से भगाया गया। कुछ देर बाद पीएसी जवानों से भरी बस कोतवाली पहुंची, जिसमें कपड़े लाए गए थे। कोतवाली में ही मुख्यमंत्री ने कपड़े बदले और बस की सीटों के बीच बैठकर जीआईसी ग्राउंड पर बने स्टेज तक पहुंचे। बरेली कॉलेज के शिक्षक चौधरी नरेंद्र सिंह अपने शिष्यों के साथ वहां भी मंच पर पहुंच गए और मुख्यमंत्री के हाथों से माइक छीन लिया। इस दौरान छात्र उग्र हो गए। इस पर मौजूद पुलिसकर्मियों ने फिर लाठीचार्ज किया। यहां पुलिसकर्मियों व छात्रों के बीच जमकर संघर्ष हुआ। कई छात्र घायल हुए। तत्कालीन सीओ शिवकुमार सिंह ने कर्फ्यू की घोषणा कर दी। इसके बाद करीब 33 दिनों तक सभी को जेल काटनी पड़ी। यह राष्ट्रीय स्तर का मुद्दा बना। इसके बाद मुख्यमंत्री पूर्वी क्षेत्र के एक जिले में जनसभा करने गए। वहां उन्हें बुंदेलखंड विश्वविद्यालय की मांग के लिए ज्ञापन सौंपा गया। फिर 15 फरवरी 1974 का दिन आ ही गया, जब मुख्यमंत्री ने एक साथ रुहेलखंड, बुंदेलखंड और गोरखपुर विश्वविद्यालय के निर्माण की घोषणा कर दी।
ईमानदारी से किए संघर्ष का नतीजा है विवि
पूर्व छात्र मनोज अवस्थी ने बताया कि मैं तब बीए पॉलिटिकल साइंस का छात्र था। उस दौरान जो संघर्ष होता था, वह आज नहीं दिखता। तब छात्रों के हक व हित की बातें होती थीं। यह राष्ट्रीय स्तर का मूवमेंट बना। रुहेलखंड विवि ईमानदारी से किए गए संघर्ष का नतीजा है। पूर्व छात्र सुरेंद्र नाथ रस्तोगी ने कहा कि वह विवि के लिए हुए संघर्ष का चश्मदीद रहे हैं। अफसोस इस बात का है कि रुविवि सबको बुलाता है, लेकिन इसकी नींव रखने वाले छात्रों को याद भी नहीं किया जाता। उस समय किया गया संघर्ष हमेशा याद रहेगा। छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष सुरेंद्र अग्रवाल ने कहा कि रुहेलखंड विश्वविद्याल की मांग विद्यार्थी परिषद के कार्यालय से उठी थी। इसमें सभी छात्रों व शिक्षकों का सहयोग मिला। लंबा समय लगा, लेकिन अंत में हमारी जीत हुई। इस मांग ने छात्रों को एकजुट किया।
इमारत बनने से पहले तीन जगह रहा विश्वविद्यालय का दफ्तर
वर्ष 1975 में रुहेलखंड विश्वविद्यालय बनने की घोषणा के बाद इमारत बनने में ही दस साल लग गए। इस बीच रुहेलखंड विवि का कार्यालय सबसे पहले स्टेशन रोड स्थित बेसिक शिक्षा विभाग के पुराने कार्यालय में संचालित हुआ। कुछ समय बाद ठिकाना बदला। कचहरी की एक गली में इसे स्थानांतरित किया गया। इसके बाद कैंट के फूल बाग के पास बंगला नंबर 12 में भी रुहेलखंड विवि का कार्यालय चलता रहा। मौजूदा सीडीओ आवास तब कुलपति का आवास हुआ करता था।
पहले कुलपति रहे डॉ. आनंद शरण रतूड़ी
वर्ष 1975 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के डॉ. आनंद शरण रतूड़ी को रुहेलखंड विवि का पहला कुलपति बनाया गया। बरेली कॉलेज के हॉकी ग्राउंड पर शिक्षकों व छात्रों ने उनका स्वागत किया था। इस दौरान छात्रों की ओर से कुलपति को मांग पत्र भी सौंपा गया था।
दस साल बाद मिला भवन, अब वैश्विक रैंकिंग बढ़ा रही शान
रुहेलखंड विश्वविद्यालय को अपनी इमारत 15 फरवरी 1985 को मिली। तब कैंपस में छात्रावास नहीं थे। एमएससी प्लांट साइंस व एनिमल साइंस, एमए इतिहास व अर्थशास्त्र के पाठ्यक्रम ही संचालित थे। इसके बाद शिक्षा, विधि व व्यवसाय प्रबंधन विभाग खोले गए। वर्ष 1995 में अभियांत्रिकी, होटल प्रबंधन सहित अन्य विभाग खुले। 51 वर्ष की यात्रा में रुहेलखंड विवि ने नैक मूल्यांकन में ए प्लस श्रेणी में जगह बनाई। कई वैश्विक रैंकिंग में भी दबदबा कायम किया। इस समय विवि में 55 से अधिक पाठ्यक्रम संचालित किए जा रहे हैं।
संघर्षियों ने कहा- 30 वर्ष से नहीं हुए सीनेट के चुनाव
विश्वविद्यालय का संचालन एक सीनेट के अधीन होता था, जिसमें 15 सदस्य और तीन एग्जीक्यूटिव काउंसिल के पदाधिकारी चुने जाते थे। पूर्व छात्रों का कहना है, रुहेलखंड विवि के तत्कालीन वीसी मुरलीधर तिवारी के कार्यकाल से ही सीनेट का चुनाव बंद हो गया। वर्ष 1998 के दीक्षांत समारोह को लेकर भी कुलपति एमडी तिवारी और स्थानीय राजनेता व तत्कालीन कैबिनेट मंत्री संतोष गंगवार में खींचतान की सुगबुगाहट थी। उस वक्त राज्यपाल रहे सूरज भान ने दीक्षांत समारोह को रद्द कर दिया था।
झारखंड के राज्यपाल संतोष गंगवार को लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड
रुहेलखंड विश्वविद्यालय की स्थापना के संघर्ष में सहयोग करने वाले झारखंड के वर्तमान राज्यपाल संतोष गंगवार को 23 वें दीक्षांत समारोह में रुहेलखंड विश्वविद्यालय की ओर से लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड दिया गया।
इन हस्तियों ने भी की रुहेलखंड विवि में पढ़ाई
क्रिकेटर मोहम्मद शमी, अभिनेता राजपाल यादव, बीसीसीआई के पूर्व सीईओ राहुल जौहरी, फिल्मकार विनोद कापड़ी, राजनेता स्वामी प्रसाद मौर्य, दिवंगत विधायक प्रो. श्याम बिहारी लाल जैसी हस्तियों ने भी रुहेलखंड विश्वविद्यालय से पढ़ाई की थी।
इन्होंने किया गौरवान्वित
गुजरात के प्रिंसिपल चीफ कन्जर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट व हेड ऑफ फॉरेस्ट के रूप में कार्यरत डॉ. एपी सिंह ने वर्ष 1988 में रुविवि से एमएससी प्लांट साइंस की पढ़ाई पूरी की। उन्होंने बताया कि उस समय विवि शहर से बहुत दूर पड़ता था। छात्रावास भी नहीं थे। बस से आते-जाते थे। यहां से पढ़ाई के बाद वर्ष 1988 में ही शोध के लिए इंडियन एग्रीकल्चर रिसर्च इंस्टीट्यूट दिल्ली गए। एक साल बाद ही इंडियन फॉरेस्ट सर्विस में चयन हो गया।राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय शिमला की वाइस चांसलर प्रो. प्रीति सक्सेना ने भी रुहेलखंड विश्वविद्यालय से संबद्ध कॉलेज से एलएलबी की थी। बाबा साहब भीमराव अंबेडकर सेंट्रल यूनिवर्सिटी से एलएलएम के बाद वह कैंपस में विधि की प्रोफेसर भी रहीं। फिर शिमला स्थित नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी की वाइस चांसलर बनीं। वह बताती हैं कि उनके लिए रुहेलखंड विश्वविद्यालय बेहद खास है। यहां पढ़ने के साथ ही पढ़ाने का भी मौका मिला।एआई स्टार्टअप की स्थापना करने वाले अंकुश अरोड़ा ने यहां से होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई पूरी की। वह बताते हैं कि यहां पढ़ाई के साथ ही नए अवसरों की तलाश शुरू कर दी थी। समय के साथ विश्वविद्यालय को भी बढ़ते देखकर अच्छा लग रहा है।
एआई स्टार्टअप जेंसिया डॉट एआई से शुरुआत की। कई स्टार्ट में सहयोग करने के बाद अब नए स्टार्टअप पर कार्य कर रहे हैं।रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड में वाइस प्रेसिडेंट एवं हेड रिवार्ड्स के पद पर कार्यरत आशीष नारायण ने वर्ष 2003 में रुहेलखंड विश्वविद्यालय से मैकेनिकल इंजीनियरिंग पास की थी। वह वर्ष 2004 में रिलायंस में भर्ती हुए, फिर वर्षों की मेहनत के बाद इस पोस्ट पर पहुंचे। उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय का इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित हुआ है। विश्वविद्यालय ने हमेशा छात्रों को अच्छी नींव दी है। रिलायंस की ओर से बीच में छात्रों की भर्ती की थी, जो अच्छा कर रहे हैं।मुंबई स्थित न्यूक्लियर पॉवर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड में वैज्ञानिक ऑफिसर के रूप में कार्यरत रूपेश अग्रवाल भी रुहेलखंड विवि के छात्र रहे हैं। उन्होंने बताया कि वर्ष 2000 में इंजीनियरिंग पास की थी। तब लगता था कि हम सबसे पिछड़े हुए हैं, लेकिन हकीकत में हम दूसरों से अच्छा कर रहे थे। बीते वर्ष एल्युमिनाई मीट में रुहेलखंड विश्वविद्यालय पहुंचा था। परिसर इतना विकसित हो गया है कि पहचान भी नहीं सका, लेकिन पीछे मुड़कर देखने पर खुशी होती है।बहेड़ी की केसर शुगर मिल के सीईओ शरत मिश्रा रुहेलखंड विश्वविद्यालय से एमबीए करने वाले प्रथम बैच के छात्र रहे। उन्होंने बताया कि तब एमबीए कोर्स इतिहास विभाग की बिल्डिंग के तीन कमरों में संचालित होता था। झोपड़ी में कैंटीन संचालित होती थी। अब इंफ्रास्ट्रक्चर तेजी से बदल गया है। पहले रुविवि से सेटेलाइट तक कोई सवारी या आबादी ही नहीं थी। अब रुविवि शहर का हिस्सा बन चुका है।
विधि विभाग ने दिए कई न्यायिक अधिकारी
बिहार में अपर जिला जज राम प्रकाश यादव, सीतापुर में सिविल जज प्रिया मिश्रा, सिविल जज ब्रह्म पाल, सुदेश कुमारी, अपर जिला जज गीता सिंह, अभियोजन अधिकारी विपर्णा गौर, सिविल जज मोहित महेश, स्पेशल मजिस्ट्रेट अखिलेश शुक्ला, सिविल जज धर्मेंद्र कुमार यादव, जस्टिस जीआर मूलचंदानी भी रुहेलखंड विवि के छात्र रहे हैं।







